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कर्नाटक और आंध्रप्रदेश सरकार ने नबालिकों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागया

हाल ही में कर्नाटक और आंध्रप्रदेश सरकार ने नबालिकों की सुरक्षा और हितों को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है।

 

कर्नाटक सरकार ने 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए और आंध्रप्रदेश सरकार ने 13 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लागया है। इस तरह कर्नाटक सरकार 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने वाला भारत का पहला राज्य बन गया हैं। 

सोशल मीडिया पर प्रतिबंधों की यह घोषणा कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 2026-2027 के बजट भाषण में की है, जबकि आंध्रप्रदेश के मुखेमन्त्री चंद्रबाबू नायडू ने कहा की इस नियम को लागू करने के लिए लगभग 90 दिनों में व्यवस्था बनाई जाएगी। 

केंद्र सरकार का पक्ष

केंद्र सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में 15-24 आयु वर्ग के लोगों में अत्यधिक स्क्रीन उपयोग और बिगड़ती मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध को उजागर किया है। इसमें चिंता, नींद संबंधी विकार और ध्यान केंद्रित करने की क्षमता में कमी सबसे प्रमुख लक्षण बताया गया है। 


 प्रतिबंध के कारण

  • बच्चों में सोशल मीडिया की लत बढ़ना । 
  • साइबर बुलिङ्ग और गलत कंटेन्ट से सुरक्षा 
  • पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव को कम करना। 

 कानूनी पक्ष

भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार संचार और डिजिटल मध्यस्थों का विनियमन केंद्र सरकार के पूर्ण अधिकार क्षेत्र में आता है। यह मुख्य रूप से सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 और सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश) नियम 2021 द्वारा नियंत्रित होता है।  हालांकि सार्वजनिक स्वास्थ्य और बाल कल्याण, दोनों राज्य सूची के विषय है। इसीलिए कानूनी विश्लेषकों का मानना है कि इससे संवैधानिक उपयुक्तता और विधायी क्षमता के प्रश्न उठ सकते हैं।


 सोशल मीडिया पर वैश्विक प्रतिबंध

 अब तक कई देशों ने सोशल मीडिया के उपयोग पर आयु संबंधी प्रतिबंध लगा चूके है। इसमें सबसे पहले नंबर पर हैं आस्ट्रेलिया। आस्ट्रेलिया ने दिसंबर 2025 में16 वर्ष से कम आयु के बच्चों पर सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया दिया है। 

 इसके बाद फ्रांस, स्पेन, इंडोनेशिया, नेपाल आदि देशों ने भी सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है।  


 प्रतिबंध के खिलाफ़ आलोचकों का पक्ष

 सरकारों द्वारा सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंधों को लेकर कई आलोचक विरोध कर रहे है। इस विरोध के निम्नलिखित कारण है:

  •  इंटरनेट उपयोग की स्वतंत्रता:  कई आलोचक मानते हैं कि इंटरनेट उपयोग की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगाना डिजिटल उनके अधिकारों का हनन है। 

  •  डिजिटल साक्षरता और योग्यता:  क्राई आलोचकों का कहना है कि इस प्रतिबंध से बच्चों में डिजिटल साक्षरता और योग्यता से वंचित हो जाएंगे। 

  •  लैंगिक असमानता:  भारत में केवल 33.3% महिलाओं ने ही इंटरनेट का उपयोग किया जबकि पुरुषों का प्रतिशत 57.1% है।  बाल संरक्षण के नाम पर प्रतिबंध से माता-पिता अपने बेटियों के लिए डिवाइस के उपयोग में असमानता बढ़ा सकते। 

  • अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: डिजिटल अभिव्यक्ति को सीमित कर सकता है।



निष्कर्ष 

सोशल मीडिया पर पूर्ण प्रतिबंध अतार्किक है। डिजिटल हो रही दुनिया में बच्चों में डिजिटल साक्षरता को बढ़ावा देना देश के विकास में अहम योगदान दे सकता है। हालांकि इसके अविनियमित उपयोग से हो रहे दुष्प्रभाव से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में सोशल मीडिया का विनियमित उपयोग अत्यंत आवश्यक हो जाता है। इसमें अभिभावक, शिक्षक, समाज, सरकार और उद्योग जगत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। इसमें लाभ को बढ़ाने और हानिकारक प्रभावों को कम करने पर विचार किया जा सकता है।


पहलगाम आतंकी हमला और भारत के प्रधानमंत्री मोदी की बिहार की रैली में दिए गए चेतावनी से उपजे सवालों का अभी तक जवाब नहीं मिला

हाल ही में, भारत के केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में एक बहस के दौरान बताया कि भारतीय सेना के एक संयुक्त अभियान (ऑपरेशन महादेव) में तीन आतंकवादियों को मार गिराया गया है।  ये आतंकवादी पहलगाम  आतंकी हमले के लिए जिम्मेदार थे। उन्होंने इसे भारत की "सख्त आतंकवाद नीति" का उदाहरण बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी सुरक्षा बलों को बधाई दी और कहा कि इस आपरेशन से आतंकवादियों को उनके अपराध की "सही सजा" मिली है। 



ऑपरेशन महादेव के बारे में

यह ऑपरेशन भारतीय सेना, CRPF और जम्मू-कश्मीर पुलिस की संयुक्त टीम ने चलाया था। यह ऑपरेशन 27-28 जुलाई, 2025 को चलाया गया था। इसका उद्देश्य पहलगाम हत्याकांड के जिम्मेदार आतंकवादियों को पकड़ना या मार गिराना था। 

अमित शाह ने संसद को बताया कि मारे गए तीनों आतंकवादियों में से एक हाशिम मूसा (उर्फ सुलेमान शाह) पहलगाम हमले का मास्टरमाइंड था। यह लश्कर-ए-तैयबा से जुड़ा हुआ था। उन्होंने दो अन्य आतंकवादियों के कोडनेम भी बताएं- "अफगान" और "जिब्रान"

मारे गए यह आतंकी श्रीनगर जिले के हरवन-हिदवास क्षेत्र में छिपे हुए थे। यह क्षेत्र श्रीनगर शहर के बाहरी इलाके में पड़ता है। यह एक घना और दुर्गम जंगल वाला इलाका है, जो आतंकवादियों को छिपने और बचने के लिए आदर्श माना जाता है। सुरक्षा बलों को सुराग मिला था कि पहलगाम हमले के आरोपी आतंकी इसी इलाके में छिपे हुए हैं।

आतंकियों की पहचान

अब सवाल यह है कि क्या वास्तव में मारे गए इन आतंकियों का संबंध पहलगाम हमले से था जैसा कि सरकार ने  दावा किया है। इस सवाल को विपक्ष ने भी उठाया है। सरकार ने इन आतंकवादियों का संबंध पहलगाम हत्याकांड से होने का निम्नलिखित सबूत संसद में पेश किया है:

  • स्थानीय लोगों और गिरफ्तार किए गए संदिग्धों ने इन आतंकवादियों की पहचान की है।
  • पाकिस्तानी वोटर आईडी कार्ड 
  • पाकिस्तानी चॉकलेट और सामान 
  • हथियार, जिनकी फॉरेंसिक जांच से पुष्टि हुई है कि यही हथियार पहलगाम हत्याकांड में इस्तेमाल हुए थे।
सरकार के यह सबूत कितने सही हैं और कितने गलत है, यह कह पाना बहुत मुश्किल है। चुकी सरकार ने यह सबूत संसद में पेश किए हैं इसलिए इसे सत्य मानकर चलना ही उचित होगा।


पहलगम आतंकी हमला 

यह हमला 22 अप्रैल, 2025 को किया गया था। इस हमले में 5 आतंकवादियों ने 26 लोगों को मार दिया था। इस हमले की जिम्मेदारी पाकिस्तान स्थित और Lashkar-e-Taiba से संबंधित आतंकवादी समूह The Resistance Front (TRF) ने ली थी। हालांकि बाद में उसने अपना दावा वापस ले लिया था। 

इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार की अपनी एक रैली में कहा था कि "जिन्होंने यह हमला किया है उन आतंकियों को और इस हमले की साजिश रचने वालों को उनकी कल्पना से भी बड़ी सजा मिलेगी।" तो सवाल यह है कि क्या उनको यह सजा मिली? इस सवाल का उत्तर जानने से पहले हम यह जानते है कि आखिरकार ये साजिशकर्ता है कौन?

पहलगाम हमले के मुख्य साजिशकर्ता कौन?

प्रधानमंत्री ने बिहार की रैली में दो तरह के लोगों की तरफ पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित किया- पहला, इस हमले को अंजाम देने वाले लोग; और दूसरा, इसके साजिशकर्ता।
  • पहला, पहलगम हमले को अंजाम देने वाले लोग: इस हमले को पाँच आतंकियों ने अंजाम दिया था। इसमें से एक आतंकवादी को जिसे पहलगाम हत्याकांड का मास्टरमाइंड कहा जा रहा था, को मार गिराया गया। 
  • दूसरा, साजिशकर्ता: पहलगाम हमले के साजिशकर्ताओं की जानकारी पकड़े गए संदिग्धों के बयानों, ड्रोन फूटेजों, आतंकवादियों से प्राप्त सबूतों और बयानों,  विशेषज्ञों की रिपोर्टों, और आम लोगों की राय से पता चलता है। ये सभी संकेत पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों, ISI और पाकिस्तानी आर्मी चीफ की तरफ जाते है। कई अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और मीडिया ने भी इशारा किया कि ISI और पाकिस्तानी सेना की सहमति या चुपचाप समर्थन के बिना इतनी बड़ी घुसपैठ और हमला संभव नहीं था। भारत ने इस हमले को राज्य प्रायोजित सीमा पार आतंकवाद (State-sponsored cross-border terrorism) कहा। 

क्या पहलगाम हमले के जिम्मेदार आतंकवादियों और साजिशकर्ताओं को कड़ी सजा मिली?

भारत ने पहलगाम हमले के जिम्मेदार आतंकवादियों और सजिशकर्ताओं को कड़ी सजा देने के लिए ऑपरेशन सिंदूर और महादेव चलाया। इसके अलावा अंतर्रास्ट्रीय प्रयास भी किए। कई देशों ने पहलगाम हमले की कड़ी निंदा की। अमेरिका ने TRF को आतंकवादी संगठन घोषित किया। UN Secrity Council ने भी अपनी रिपोर्ट में TRF का नाम शामिल किया। भारत के प्रयासों के बावजूद भी FATF ने पहलगाम हमले के लिए पाकिस्तान की कड़ी निंदा तो की लेकिन उसे ग्रे या ब्लैक लिस्ट में शामिल नहीं किया। FATF ने कहा  "This, and other recent attacks, could not occur without money and the means to move funds between terrorist supporters." यानी, ऐसे हमले आतंकवादी फंडिंग और वित्तीय लेन-देन की मौजूदगी के बिना संभव ही नहीं होते हैं। यही नहीं, IMF ने भी पाकिस्तान को करीब $1 अरब का तत्काल भुगतान जारी कर दिया और नए $1.4 अरब RSF फंड को मंजूरी दे दी

ऑपरेशन सिंदूर (Operation Sindoor)

यह भारत द्वारा पहलगाम आतंकी हमले (22 अप्रैल 2025) के जवाब में पाकिस्तान और PoK में किए गए सटीक सैन अभियान का नाम है। यह मिशन 7 मई 2025 की रात 1:05 बजे से 1:30 बजे तक चला, जिसमें भारतीय सेना, नौसेना और वायुसेना ने मिलकर 9 आतंकवादी ठिकानों पर सटीक वार किए। इन ठिकानों में Jaish-e-Mohammed, Lashkar-e-Taiba और Hizbul Mujahideen के रिक्रूटमेंट, प्रशिक्षण और कमांड सेंटर शामिल थे। भारत ने स्पष्ट किया कि किसी भी पाकिस्तानी सैन्य आधार या नागरिक इलाके को निशाना नहीं बनाया गया। केवल आतंकवादी संरचना को निशाना बनाया गया था। भारतीय सूत्रों के अनुसार, लगभग 70 आतंकवादी मारे गए और 60 घायल हुए; जबकि पाकिस्तान ने 8–9 नागरिकों की मौत होने की जानकारी दी। इस ऑपरेशन में पाक सेना की संचार प्रणाली और साइबर कमांड को ध्वस्त कर दिया गया। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने इस ऑपरेशन में पाकिस्तानी सिक्योरिटी और आतंकी ठिकानों को भारी नुकसान पहुँचाया। 

ऑपरेशन महादेव (Operation Mahadev)

ऊपर हम पढ़ चुके है कि ऑपरेशन महादेव के तहत तीन आतंकवादियों को मार गिराया गया। इसमें से एक को पहलगाम हमले का मास्टरमाइंड बताया गया। 

क्या भारत पहलगाम हमले का बदल ले लिया है?

इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत ने पाकिस्तान को और उसके द्वारा प्रायोजित आतंकवाद को मुहतोड़ जवाब दिया है। लेकिन अभी तक भारत ने पहलगाम हमले के जिम्मेदार 1-3 आतंकियों को ही मार है। अभी भी कम-से-कम दो आतंकी बाकी है। साथ ही, ऑपरेशन सिंदूर में कितने आतंकी और साजिशकर्ता मारे गए, इसके कोई पुख्ता सबूत नहीं है। 

वास्तव में, अगर देखा जाय तो पहलगाम हमले का असली साजिशकर्ता हमले को अंजाम देने वाले आतंकी नहीं, बल्कि पाकिस्तानी आर्मी और ISI है, जिन्होंने आतंकियों को सहायता, सुविधा, प्रशिक्षण और हथियार दिए है। भारत के प्रधानमंत्री ने बिहार की रैली में कहा था कि साजिशकर्ताओं को भी उनकी कल्पना से कड़ी सजा मिलेगी। तो अब सवाल यह है कि क्या उन्हें यह सजा मिली? इसका उत्तर है- नहीं; क्योंकि न तो अभी तक ISI प्रमुख मारा गया और न ही पाकिस्तान आर्मी चीफ (General Asim Munir)। पाकिस्तान ने सेना और लोगों का मनोबल ऊंचा बनाए रखने के लिए आसिम मुनिर को पाकिस्तानी आर्मी का सर्वोच्च पद "Field Marshal" के रूप में प्रमोशन दे दिया। यही नहीं, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने आशिफ मुनीर को व्हाइट हाउस में बुलाकर न सिर्फ उसके साथ लंच किया बल्कि ऑपरेशन सिंदूर को रुकवाने में उसकी भूमिका की प्रशंसा भी की। इसके अलावा अमेरिका ने पाकिस्तान के तेल भंडारों की खोज और विकास में निवेश करने की घोषणा की है। अमेरिका ने भारत पर कुल 35% का टैरिफ लगाया है, वहीं पाकिस्तान पर 20% का टैरिफ लगाया है। यह अमेरिका की भारत के साथ दोहरे व्यवहार को दर्शाता है। यानी अमेरिका चीन और रूस को साधने के लिए भारत का इस्तेमाल करता है, जबकि भारत को साधने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करता है। वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर आतंकवाद के खिलाफ बोलता है लेकिन पाकिस्तान के जरिए अप्रत्यक्ष और चुपके से आतंकवाद को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करता है। चीन पर भी यही बात लागू होता है। चीन ने तो इस तनाव में भारत के खिलाफ पाकिस्तान का खुलकर समर्थन किया है।

निष्कर्ष 

उपर्युक्त बातों से एक बात तो समझ में आ गई है कि भारत को कम-से-कम तीन मोर्चों पर युद्ध के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए। पहला पाकिस्तान, दूसरा चीन और तीसरा संभावित अन्य देश। हमने 1971 के युद्ध में तीसरे देश के रूप में भारत के खिलाफ अमेरिका की भूमिका को देख चुके है। यह भी हो सकता है कि भविष्य में तीसरे देश के रूप में हमारा कोई पड़ोसी देश हो। इसके अलावा भारत को अपनी खुफिया एजेंसियों को और मजबूत बनाने, भविष्य की नई रक्षा तकनीकों को अपनाने, पर्याप्त रक्षा सामग्रियों और ढ़ाचों का विकास करने और सैनिकों के भविषोंमुख प्रशिक्षण आदि पर ध्यान देना चाहिए। आर्थिक स्थिति भी युद्ध में बड़ी भूमिका निभाती है, तो इस पर भी ध्यान देना चाहिए। भारत को युद्ध या तनाव के हालातों में अपनी अंतर्रास्ट्रीय  कूटनीति को और मजबूत बनाने की जरूरत हैं ताकि अन्य देश उसके साथ खड़े रहे। 

मणिपुर के इंफाल में एक बार फिर विरोध प्रदर्शन क्यों शुरू हो गया है

मणिपुर सरकार ने शनिवार रात 11.45 बजे से पांच दिनों के लिए घाटी के पांच जिलों (इंफाल पश्चिम, इंफाल पूर्व, थौबल, बिष्णुपुर और काकचिंग) में इंटरनेट और मोबाइल डेटा सेवाओं, जिसमें वीसैट (VSAT) और वीपीएन (VPN) भी शामिल है, को निलंबित करने का आदेश दिया है।

सरकार ने यह आदेश मैतेई समुदाय के अरम्बाई टेंगोल (AT) स्वयंसेवी संगठन के नेता कानन सिंह की गिरफ्तारी के बाद हुए विरोध प्रदर्शनों के बाद दिया है।

सरकार को इस बात की आशंका है कि कुछ असामाजिक तत्व लोगों की भावनाओं को भड़काने के लिए तस्वीरें, अभद्र भाषा और नफरत भरे वीडियो संदेश प्रसारित करने के लिए सोशल मीडिया का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल कर सकते हैं, जिसका राज्य की कानून व्यवस्था पर गंभीर असर पड़ सकता है। 

सरकार ने कहा है कि आदेश का उल्लंघन करने का दोषी पाए जाने वाले किसी भी व्यक्ति पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। 


क्या है पूरा मामला?

दरअसल इस विरोध प्रदर्शन की पृष्ठभूमि 2023 की भीषण जाति हिंसा ने तैयार किया है। 2023 में मैतेई और कुकी जनजातियों के बीच भीषण जाति हिंसा हुए। इस हिंसा में शामिल अपराधियों को प्रशासन गिरफ्तार कर रही है। 

हाल ही में, कुकी जनजाति के एक संदिग्ध को प्रशासन ने सीमावर्ती शहर मोरेह से गिरफ्तार किया था। इस पर अक्टूबर 2023 में एक पुलिस अधिकारी की स्नाइपर राइफल से हत्या करने का आरोप था। इसकी गिरफ्तारी के विरोध में कुकी जनजातीय ने विरोध प्रदर्शन करना शुरू कर दिया। 

कुकी समुदाय ने मणिपुर पुलिस अधिकारी संगठन चिंगथम की हत्या के मामले में आरोपी 'कामगिनथांग गंगटे' की मनमाने ढंग से गिरफ्तारी का आरोप लगाया और मोरेह स्थित टैंगोपाल जिले में बंद का आह्वाहन किया।

इसी बीच प्रशासन ने मैतेई संगठन (AT) के नेता कानन सिंह को गिरफ्तार कर लिया, जिसके विरोध में AT के युवा सदस्यों ने मणिपुर की राजधानी इम्फाल में प्रदर्शन कर रहे हैं।

इन प्रदर्शनों के देखते हुए किसी भी अप्रिय घटना से बचने के लिए प्रशासन ने मोबाइल सेवाओं को निलंबित करने का फैसला लिया।


मणिपुर में जाति हिंसा का इतिहास

मणिपुर में जातीय हिंसा का इतिहास जटिल, गहरा और लंबे समय से चला आ रहा है। यह मुख्यतः मैतेई, नागा और कुकी समुदायों के बीच पहचान, भूमि अधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सांस्कृतिक वर्चस्व को लेकर टकराव का परिणाम है।


 मणिपुर में जातीय हिंसा का इतिहास (विस्तार से)

1. प्रमुख समुदाय कौन हैं?

समुदाय धर्म क्षेत्र विशेषताएँ
मैतेई हिंदू/सनातन इंफाल घाटी      बहुसंख्यक (राजनीतिक व प्रशासनिक दबदबा)
कुकी ईसाई                पहाड़ी क्षेत्र      आदिवासी पहचान, ST दर्जा प्राप्त
नागा ईसाई पहाड़ों में      अलग नागालिम की माँग, NSCN आंदोलन

2. प्रारंभिक टकराव और पृष्ठभूमि

  • 1980–90 का दशक: उग्रवादी संगठन जैसे UNLF, PLA, NSCN (IM) ने अलग मणिपुर/नागालैंड की माँग की। इस समय तक मणिपुर में अफस्पा लागू हो चुका था।

  • मैतेई बनाम नागा और कुकी: घाटी में रहने वाले मैतेई लोगों को लगता रहा कि राज्य की राजनीतिक ताकत उन्हीं के हाथ में होनी चाहिए, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों के कुकी व नागा समुदायों ने स्वायत्तता की माँग तेज की।


3. 1990 के दशक में मैतेई-कुकी टकराव

  • 1993 में भीषण दंगे हुए थे:

    • कुकी और नागा उग्रवादियों के बीच हिंसा हुई।

    • हजारों लोग मारे गए और हज़ारों विस्थापित हुए।

    • इससे कुकी-नागा संबंध भी लंबे समय के लिए खराब हो गए।


4. 2023 की सबसे बड़ी जातीय हिंसा

    पृष्ठभूमि:

  • मैतेई समुदाय ने ST (अनुसूचित जनजाति) दर्जा माँगा, जिससे कुकी और नागा समुदायों में आक्रोश हुआ।

  • 3 मई 2023 को, “ट्राइबल यूनिटी मार्च” के दौरान कुकी समुदाय ने इसका विरोध किया।

  • इसके बाद घाटी और पहाड़ों में सांप्रदायिक दंगे फैल गए।

  हिंसा का असर:

  • 200+ लोग मारे गए, 50,000+ लोग विस्थापित हुए।

  • हजारों घर, चर्च, मंदिर जलाए गए।

  • महिलाओं के साथ अत्याचार (जैसे कि वायरल हुआ नग्न परेड कांड) ने पूरे देश को झकझोर दिया।


5. राजनीतिक परिप्रेक्ष्य

  • राज्य में भाजपा सरकार (मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह – मैतेई समुदाय से) है।

  • आरोप लगे कि सरकार ने मैतेई पक्ष को बचाव दिया, जिससे कुकी समुदाय में गहरी असंतोष की भावना उत्पन्न हुई।


6. वर्तमान स्थिति (2024-2025 तक)

  • मणिपुर दो भागों में बँट गया है – घाटी (मैतेई बहुल) और पहाड़ (कुकी बहुल)।

  • बीच का विश्वास टूट गया है। कई लोग अपने घर नहीं लौट पाए हैं।

  • अक्सर हिंसा के बाद इंटरनेट बंद, कर्फ्यू, और आर्मी फ्लैग मार्च आम बात हो गई है।


क्यों यह हिंसा बार-बार भड़कती है?

कारण विवरण
🌐 भूमि अधिकार                   मैतेई पहाड़ी क्षेत्र में ज़मीन नहीं ले सकते, कुकी-नागा घाटी में नहीं
🧾 ST दर्जा विवाद मैतेई चाहते हैं आरक्षण, कुकी-नागा इसका विरोध करते हैं
⛳ पहचान की लड़ाई   हर समूह अपनी भाषा, संस्कृति, और क्षेत्रीय पहचान को प्राथमिकता देता है
🏛️ प्रशासनिक पक्षपात कुकी समुदाय का आरोप है कि राज्य सरकार मैतेई पक्षपाती है
🔫 उग्रवादी संगठन अब भी कई हथियारबंद गुट सक्रिय हैं, जो शांति प्रक्रिया में बाधा हैं

निष्कर्ष:

मणिपुर की जातीय हिंसा सिर्फ वर्तमान राजनीति या घटनाओं का नतीजा नहीं है। यह दशकों पुराने पहचान, भूमि, आरक्षण और प्रशासनिक असमानता की लड़ाई का विस्तार है। समाधान तभी संभव है जब सभी समुदायों के बीच विश्वास बहाल हो, और निष्पक्ष शासन व संवाद को बढ़ावा मिले।


भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने 'छद्म युद्ध' (Proxy War) को लेकर पाकिस्तान पर लगाया 'गम्भीर' आरोप

हाल ही में, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के भुज में एक जनसभा को संबोधित करते हुए पाकिस्तान पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को एक 'छद्म युद्ध' (Proxy War) के रूप में नहीं बल्कि एक 'सुनियोजित युद्धनीति' के रूप में अपनाया गया है।

पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में अशांति उत्पन्न करने के लिए लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकवादी समूहों को वित्त पोषण, प्रशिक्षण और हथियार देकर भारत के खिलाफ प्रॉक्सी वॉर का उपयोग करता है।

हालांकि, उन्होंने इसे लेकर पाकिस्तान को कड़े शब्दों में सख्त चेतावनी दी। उन्होंने कहा कि भारत अब इसे उसी तरह से जवाब देगा। साथ ही, उन्होंने कहा कि पाकिस्तान की सरकार और सेना आतंकवाद को अपनी रोजी-रोटी बना चुकी है। उन्होंने पाकिस्तान के नागरिकों से अपील की कि वह शांति का रास्ता चुने अन्यथा भारत की 'गोली' तैयार है। 

प्रधानमंत्री ने आगे कहा कि भारत अब आतंकवाद पर चुप नहीं बैठेगा और ऑपरेशन सिंदूर जैसे सैन्य अभियानों को जन आंदोलन में बदलने की प्रतिबद्धता जताई।



प्रॉक्सी वॉर क्या है?

यह ऐसा संघर्ष होता है, जिसमें कोई देश स्वयं सीधे तौर पर शामिल नहीं होता, लेकिन गैर-राज्य अभिकर्ताओं (जैसे आतंकी संगठन, जासूस आदि) को समर्थन देकर दूसरे देश को नुकसान पहुंचाता है।

यह हाइब्रिड वॉरफेयर का एक उप-समूह है, जिसमें पारंपरिक सैन्य रणनीति और अपरंपरागत तरीकों का एक साथ इस्तेमाल किया जाता है। इसमें अक्सर साइबर वॉरफेयर, आतंकवाद (प्रॉक्सी वॉर) आदि शामिल होते हैं।

प्रॉक्सी वॉर के साधन

इसमें गैर-राज्य अभिकर्ताओं को प्रशिक्षण और सैन्य सहायता देना; आर्थिक सहायता प्रदान करना; खुफिया जानकारी साझा करना; सोशल मीडिया का उपयोग करना (जैसे, गलत सूचना प्रसार); साइबर टूल्स आदि शामिल हैं।


प्रॉक्सी वार (Proxy War) का भारत पर प्रभाव

1. संप्रभुता को चुनौती

उदाहरण के लिए- पाकिस्तान जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद को समर्थन और सहायता देकर इस पर भारत की संप्रभुता को चुनौती देने की निर्रथक कोशिश करता रहता है।

2. हिंसा और जान-माल की हानि

उदाहरण के लिए- पाकिस्तान की तरह चीन भी पूर्वोत्तर राज्यों में उग्रवादी समूहों को अप्रत्यक्ष समर्थन देता हैं, जिसके कारण बड़ी संख्या में आम नागरिक और सैन्य कर्मी हताहत हुए हैं।

3. आर्थिक बोझ

Proxy War के चलते भारत को सुरक्षा पर अधिक व्यय करना पड़ता है, जिससे सामाजिक अवसंरचना पर व्यय हेतु धन की उपलब्धता कम हो जाती है।


प्रॉक्सी वॉर (Proxy War) के पीछे के कारण

पाकिस्तान भारत के खिलाफ क्यों लड़ता रहता है?

पाकिस्तान का भारत के खिलाफ लड़ने के पीछे कई कारण है:
  • 1971, 1999 जैसे कई युद्धों में पाकिस्तान की हार
  • ब्लूचिस्तानी अगववादियों को भारत पर समर्थन देना का आरोप
  • भारत का आर्थिक, सैन्य, और तकनीकी विकास
  • अमेरिका और चीन जैसे देशों का पाकिस्तान को अप्रत्यक्ष समर्थन
  • जम्मू कश्मीर का विकास और शांति तथा पाकिस्तान का हिस्सा न बनना, आदि।

पाकिस्तान proxy war पर ही जोर क्यों देता है?

  • अपनी भागीदारी का खंडन करना: इसमें प्रत्यक्ष दोषारोपण और अंतर्राष्ट्रीय परिणामों से बचना शामिल है।
  • छद्म रणनीतियांः खुफिया जानकारी एकत्र करना और प्रत्यक्ष भागीदारी के बिना दूर से ही किसी देश में घटनाओं को अंजाम देना। उदाहरण के लिए- स्लीपर सेल (OGW) और हाल ही में सोशल मीडिया इनफ्लुएंसर (जैसे ज्योति मल्होत्रा आदि) का इस्तेमाल करने जैसे मामले सामने आए हैं। 
  • कम लागत व ज्यादा नुकसानः इसमें अपने सैनिकों की जान का कम नुकसान और आतंकियों पर कम खर्च करके दुश्मन देश को ज्यादा नुकसान पहुंचाना और उसकी युद्ध लागत को बढ़ाना शामिल है। उदाहरण के लिए- भारत के खिलाफ पाकिस्तान की "थाउसेंड कट्स" की रणनीति। यह रणनीति, भारत को हजार गांव से लहूलुहान करना पाकिस्तानी सेना द्वारा भारत के विरुद्ध अपनाया जाने वाला एक सैन्य सिद्धांत है।


Proxy War के खिलाफ़ भारत द्वारा उठाए गए कदम

नया 3 स्तंभ सुरक्षा सिद्धांत

इसे हाल ही में, भारत के प्रधान मंत्री द्वारा घोषित किया गया है। इसमें प्रॉक्सी वॉर को भारत के खिलाफ प्रत्यक्ष युद्ध माना गया है।

सीमा प्रबंधन का आधुनिकीकरण

उदाहरण के लिए व्यापक एकीकृत सीमा प्रबंधन प्रणाली (CIBMS), जिसमें नियंत्रण रेखा पर स्मार्ट फेंस (बाड़) लगाना, थर्मल इमेजिंग और मोशन सेंसर शामिल हैं।

साइबर सुरक्षा को मजबूत करना

जैसे Cert-in और NTRO की स्थापना।

अंतर्राष्ट्रीय मंचों का इस्तेमाल

उदाहरण के लिए- पाकिस्तान स्थित आतंकवादियों पर प्रतिबंध लगाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 समिति का उपयोग करना।

ऑपरेशन शिवा

हाल ही में, भारतीय सुरक्षा बलों ने अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा के लिए 'ऑपरेशन शिवा' शुरू किया।

यह ऑपरेशन पहलगाम आतंकी हमले और भारत-पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को देखते हुए शुरू किया गया है।

श्रीअमरनाथ जी गुफा के बारे में

अमरनाथ गुफा जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले में समुद्र तल से 13,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित है। पवित्र अमरनाथ गुफा में हर साल प्राकृतिक रूप से बनने वाले हिम शिवलिंग यानी बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए श्रद्धालु आते हैं।

यह भगवान शिव के लिंग स्वरूप यानी शिवलिंग का प्रतीक है।

इस गुफा में बर्फ से बने दो स्टैलेग्माइट देवी पार्वती (भगवान शिव की पत्नी) और भगवान गणेश (उनके पुत्त्र) का प्रतीक माने जाते हैं।

अमरनाथ यात्रा श्रावण माह में शुरू होती है, जब बर्फ का लिंगम पूर्ण आकार में होता है।

इस तीर्थयात्रा की उत्पत्ति का उल्लेख संस्कृत ग्रंथ “बृंगेश संहिता” में मिलता है।




इसरो (ISRO) गगनयान मिशन को लॉन्च करने का समय बता दिया

हाल ही में, इसरो (ISRO) के प्रमुख ने कहा कि 2027 की पहली तिमाही में गगनयान मिशन को लॉन्च करेगा।

टेस्ट व्हीकल एबॉर्ट मिशन-1 (TV-D1) और पहले मानवरहित टेस्ट व्हीकल एबॉर्ट मिशन की सफल समाप्ति ने आगामी परीक्षण कार्यक्रम के लिए मजबूत आधार तैयार किया है।

दूसरा टेस्ट व्हीकल मिशन (TV-D2) इसके बाद होगा, और फिर मानवरहित ऑर्बिटल उड़ानें होंगी।

पहले मानवरहित मिशन पर महिला रोबोट 'व्योममित्र' (गाइनॉयड) को भेजा जाएगा।


गगनयान मिशन के बारे में

उद्देश्यः गगनयान परियोजना का उद्देश्य मानवयुक्त अंतरिक्ष-उड़ान क्षमता का प्रदर्शन करना है। इस मिशन के तहत 3 सदस्यों के चालक दल को 400 कि.मी. की ऊंचाई पर स्थित निम्न भू-कक्षा में भेजा जाएगा। इस मिशन की अवधि 3 दिन है। उन्हें सुरक्षित रूप से समुद्र में वापस उतारा जाएगा।


गगनयान मिशन के घटक

प्रक्षेपण यान मार्क-3 (LVM-3): पहले इसे भूतुल्यकालिक प्रक्षेपण यान-मार्क III या GSLV-MK3 कहा जाता था। यह तीन चरणों वाला प्रक्षेपण यान है। ये तीन चरण हैं:

  • पहला चरणः दो ठोस ईंधन बूस्टर कोर रॉकेट से जुड़े होते हैं।
  • दूसरा चरणः इसमें दो विकास-2 तरल ईंधन इंजन होते हैं।
  • तीसरा चरण: इसमें CE-20 क्रायोजेनिक इंजन होता है, जो ईंधन और ऑक्सीडाइज़र के रूप में क्रमशः तरल हाइड्रोजन एवं तरल ऑक्सीजन का उपयोग करता है।

ऑर्बिटल मॉड्यूलः इसका वजन 8.2 टन है और इसे LVM-3 रॉकेट द्वारा निम्न भू-कक्षा में लॉन्च किया जाता है। इसमें दो मुख्य भाग होते हैं:

  1. क्रू मॉड्यूलः

  • इसमें तीन अंतरिक्ष यात्री एक सप्ताह तक रह सकते हैं। 

  • यह पैराशूट सिस्टम से लैस है, जो पृथ्वी पर वापसी के समय सुरक्षित और नियंत्रित लैंडिंग में मदद करता है। 

  • इसमें पर्यावरण नियंत्रण और जीवन रक्षक प्रणाली (ECLSS) होती है। 

  • यह तापमान, हवा की गुणवत्ता, अपशिष्ट और आग पर नियंत्रण रखती है। 

  • इसमें एक क्रू एस्केप सिस्टम होता है, जो रॉकेट लॉन्च के दौरान किसी खराबी की स्थिति में अंतरिक्ष यात्रियों को सुरक्षित बाहर निकालने में मदद करता है। 

2. सर्विस मॉड्यूलः 

  • यह ऑर्बिटल मॉड्यूल को आगे बढ़ाने के लिए प्रणोदन प्रदान करता है, जब वह रॉकेट से अलग हो जाता है। 

  • यह मॉड्यूल को पृथ्वी की ओर वापस लाने के लिए गति प्रदान करता है।


भारत पाकिस्तान के बीच युद्ध की आशंका के मद्देनजर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों से सिविल डिफेंस तैयारियों का मूल्यांकन करने के लिए मॉक ड्रिल्स आयोजित करने को कहा

गृह मंत्रालय ने देश के वर्गीकृत 244 सिविल डिफेंस जिलों में सिविल डिफेंस मॉक ड्रिल्स आयोजित करने का निर्णय लिया। यह निर्णय ऐसे समय में लिया गया है जब भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध की आशंका जताई जा रही है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद दोनों देशों के बीच तनाव अपने चरम सीमा पर पहुंच गया है।

सिविल डिफेंस जिले ऐसे जिले होते हैं, जिन पर सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से दुश्मन के हमलों का खतरा बना रहता है।



सिविल डिफेंस अभ्यास के बारे में

यह किसी भी खतरे से निपटने के लिए तैयार रहने का अभ्यास है। इसका उद्देश्य यह परीक्षण करना होता है कि युद्ध, मिसाइल हमले, हवाई हमले या आपदा जैसी आपातकालीन परिस्थितियों के दौरान नागरिक और सरकारी तंत्र किस प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं।

इस अभ्यास के दौरान अलग-अलग प्रकार के नागरिक सुरक्षा उपायों की संचालन क्षमता और समन्वय का मूल्यांकन किया जाता है। इस अभ्यास में निम्नलिखित शामिल हैं:

  • हवाई हमले की चेतावनी प्रणालियों के प्रभावी होने की क्षमता का आकलन करना,
  • भारतीय वायुसेना के साथ हॉटलाइन या रेडियो संचार लिंक का संचालन करना, और कंट्रोल रूम की कार्यक्षमता की जाँच करना ।
  • शत्रुतापूर्ण हमले की स्थिति में नागरिकों और विद्यार्थियों को आत्मरक्षा के लिए प्रशिक्षण देना।
  • छद्म उपायों (Camouflaging) द्वारा महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को हमले से बचाने की व्यवस्था करना।
  • हमले वाली जगह से सुरक्षित निकासी की योजना को अपडेट करना व उसका अभ्यास कराना।

पिछली बार ऐसी ड्रिल्स 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध से पहले आयोजित की गई थी।


भारत में सिविल डिफेंस के प्रावधान

नागरिक सुरक्षा अधिनियम, 1968: यह अधिनियम भारत-चीन युद्ध (1962) और भारत-पाक युद्ध (1965) के बाद लागू किया गया था। यह वायु, भूमि, समुद्र या अन्य स्थानों से किसी भी प्रकार के शत्रुतापूर्ण हमले से जान-माल, स्थान या वस्तु की सुरक्षा के उपायों का प्रावधान करता है।

इस अधिनियम में नागरिक सुरक्षा वाहिनी (Civil Defence Corps) के गठन और नागरिक सुरक्षा (सिविल डिफेंस) के लिए नियम एवं कानून बनाने के प्रावधान किए गए हैं।

2047 तक विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए मध्यस्थता (Mediation) एक महत्वपूर्ण साधन

यह विचार राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में आयोजित मध्यस्थता पर पहले राष्ट्रीय सम्मेलन के दौरान व्यक्त किया। इस सम्मेलन के परिणामस्वरूप "भारतीय मध्यस्थता संघ" की स्थापना की गई है।

भारतीय मध्यस्थता संघ का उद्देश्य विवादों के समाधान हेतु मध्यस्थता को एक प्राथमिक, संगठित और सुलभविकल्प के रूप में स्थापित करना और उसका व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार करना है।



मध्यस्थता के बारे में

यह आर्बिट्रेशन और सुलह (Conciliation) के साथ-साथ वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्त्रों में से एक है।

2016 से लेकर 2025 के प्रारम्भ तक मध्यस्थता के जरिए 7,57,173 मामले निपटाए गए हैं।



मध्यस्थता का महत्व

न्यायपालिका पर बोझ में कमीः इंडिया जस्टिस रिपोर्ट (IJR) 2025 के अनुसार, देश में न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या 5 करोड़ से अधिक हो चुकी है।

किफायती और शीघ्र न्यायः मध्यस्थता से महंगे कानूनी शुल्क, अदालत के खर्च और लंबी कानूनी प्रक्रिया में लगने वाले समय की बचत होती है।

सहकारी समस्या समाधानः इसमें एक तटस्थ तीसरा पक्ष बिना किसी का पक्ष लिए, संवाद को प्रोत्साहित करता है और समाधान तक पहुंचने में मदद करता है।


भारत में मध्यस्थता को बढ़ावा देने के लिए उठाए गए कदम

मध्यस्थता अधिनियम, 2023: यह एक एकीकृत व संस्थागत कानूनी फ्रेमवर्क स्थापित करता है।

वाणिज्यिक न्यायालय अधिनियम, 2015: इसे 2018 में संशोधित किया गया था ताकि प्री-इंस्टीट्यूशन एंड सेटलमेंट (PIMS) की व्यवस्था प्रदान की जा सके।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019: यह उपभोक्ता विवादों को निपटाने के लिए मध्यस्थता को एक त्वरित, आसान और किफायती तरीका के रूप में प्रोत्साहित करता है।

सिंगापुर मध्यस्थता कन्वेंशनः भारत ने इस पर हस्ताक्षर किए हैं।

भारत 'स्ट्रेटोस्फेरिक एयरशिप प्लेटफॉर्म (SAP)' का सफल परीक्षण करने वाला चुनिंदा देशों में शामिल हुआ

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) द्वारा स्ट्रेटोस्फेरिक एयरशिप प्लेटफॉर्म (SAP) के पहले सफल परीक्षण के साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है जिनके पास स्वदेशी हाई-एल्टीट्यूड प्लेटफॉर्म सिस्टम (HAPS) है।

इसे एरियल डिलीवरी रिसर्च एंड डेवलपमेंट इस्टैब्लिशमेंट (ADRDE), आगरा द्वारा विकसित किया गया है।

यह भारत की पृथ्वी-अवलोकन तथा खुफिया, निगरानी और टोही (Intelligence, Surveillance & Reconnaissance: ISR) क्षमता को बढ़ाएगा।



स्ट्रेटोस्फेरिक एयरशिप प्लेटफॉर्म (SAP) क्या है?

यह मानव-रहित एयरशिप है। यह पृथ्वी से 17 से 22 किलोमीटर की ऊंचाई पर समतापमण्डल (Stratosphere) में संचालित होता है।

यह हाई एल्टीट्यूड स्यूडो सैटेलाइट (HAPS) के रूप में कार्य करता है और लंबे समय तक हवा में रह सकता है।


HAPS दो प्रकार के होते हैं:

एयरोडायनामिकः यह हवा से भारी हो सकता है, जैसे कि फिक्स्ड विंग वाले विमान ।

एयरोस्टेटिकः यह हवा से हल्का होता है, जैसे कि गुब्बारे और एयरशिप ।

लिफ्टिंग तंत्रः यह उड़ान के लिए हीलियम (Helium) गैस का उपयोग करता है।

ऊर्जा स्रोतः यह सौर ऊर्जा से संचालित होता है और रात्रि में संचालन के लिए ऑनबोर्ड बैटरियों का उपयोग करता है।


SAP के सामरिक लाभ

स्थायी निगरानीः यह सैटेलाइट या विमानों की तुलना में किसी क्षेत्र के ऊपर कई दिनों या कई सप्ताहों तक निगरानी रख सकता है। इससे लगातार निगरानी और संचार में सहायता मिलती है।

बहु-उपयोगी प्लेटफॉर्मः इसमें इमेजिंग सेंसर, रडार और टेलीकॉम पेलोड्स लगाए जा सकते हैं। इससे सीमाओं की निगरानी, आपदा प्रबंधन और खुफिया अभियानों में मदद मिलती है।

यह तकनीक ऐसे कार्यों को भी अंजाम देने में सक्षम है, जो सैटेलाइट और ड्रोन नहीं कर पाते। इससे अंतरिक्ष जैसी व्यापक कवरेज मिलती है, वह भी कम लागत में। साथ ही इसे तेजी से तैनात किया जा सकता है और आवश्यकता अनुसार, किसी भी समय और किसी भी रूप में उपयोग में लाया जा सकता है।

भारत जीनोम एडिटेड धान (चावल) की किस्में विकसित करने वाला दुनिया का पहला देश बना

 भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने देश की पहली जीनोम-एडिटेड चावल की किस्में विकसित की है। इन किस्मों के नाम है- DRR चावल 100 (कमल) और पुसा DST चावल-1। यह उपलब्धि भारत को जिनोम एडिटिंग तकनीक से चावल विकसित करने वाला दुनिया का पहला देश बनती है।



चावल की ये किस्में CRISPR-Cas आधारित जिनोम एडिटिंग तकनीक का उपयोग करके विकसित की गई है। CRISPR-Cas आधारित जिनोम एडिटिंग तकनीक में किसी प्रजाति या फसल किस्म में किसी अन्य प्रजाति के DNA को प्रवेश कराए बिना उसके अनुवांशिक पदार्थ में सटीक संशोधन कर दिया जाता है। 

भारत की बायो सेफ्टी नियमावली के तहत सामान्य फसलों में साइट निर्देशित न्यूक्लीज-1 (SDN1) और SDN2 प्रकार की जिनोम एडिटिंग को मंजूरी दी गई है। 

ICAR ने राष्ट्रीय कृषि विज्ञान निधि (NASF) की सहायता से उपयुक्त किस्मों का विकास किया है। NASF कृषि अनुसंधान में मौलिक और राणनीतिक अध्ययन को सहायता प्रदान करती है।


चावल की नई जीनोम-एडिटेड किस्मों के बारे में

DRR चावल 100 (कमल): 

इसे भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIRR) हैदराबाद ने विकसित किया है। इस किस्म के विकास के लिए 'सांबा महसूरी' चावल की किस्म में CKX2 (साइटोकाइनिन ऑक्सीडेज 2) जिन को संशोधित किया गया। साइटोकाइनिन पादप हार्मोन है जो पौधों की वृद्धि और कोशिका विभाजन में भूमिका निभाता है।

पुसा DST चावल-1 :

इस किस्म का विकास ICAR के भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली ने किया है। यह MTU 1010 (कॉटनडोरा सन्नालू) नामक बारीक दानों वाली चावल की उन्नत किस्म है। 


साइट डायरेक्टेड न्यूक्लीज (SDN) के प्रकार

 SDN-1: इसमें DNA सीक्वेंस टेंप्लेट का उपयोग किए बिना लक्षित उत्परिवर्तन (म्यूटेजेनेसिस) किया जाता है। इसमें पौधे के प्राकृतिक रिपेयर मेकैनिज्म का उपयोग किया जाता है।

SDN-2: इसमें DNA सीक्वेंस टेंप्लेट का उपयोग करके लक्षित परिवर्तन किया जाता है। इसमें भी किसी बाहरी जिन को प्रवेश नहीं कराया जाता है।

SDN-3: इसमें किसी जीव में DNA सीक्वेंस टेंप्लेट का उपयोग करके बाहरी जिन या बड़े डीएनए सीक्वेंस को प्रवेश कराया जाता है, ताकि वांछित गुण प्राप्त किया जा सके।

 

जीनोम एडिटेड चावल की किस्मों के लाभ 

उत्पादकता में वृद्धि: उपज में 19% की वृद्धि हो सकती है।

जल संरक्षण को बढ़ावा: 7500 मिलियन क्यूबिक मीटर सिंचाई जल की बचत होगी। 

जलवायु परिवर्तन के अनुकूल ढलना: इससे ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 20% की कमी आ सकती है। 

अन्य लाभ: ऐसी चावल की किस्म सूखा, लवणता और जलवायु परिवर्तन को सह सकती है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी बेहतर उपज प्रदान कर सकती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत का पहला उर्ध्वाधर उठने वाला (Vertical lift) समुद्री रेलवे पुल का उद्घाटन किया

हाल ही में, भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तमिलनाडु में नए पंबन ब्रिज का उद्घाटन किया। यह भारत का पहला उर्ध्वाधर उठने (Vertical lift) वाला समुद्रीय रेलवे पुल है।

वर्टिकल लिफ्ट ब्रिज एक प्रकार का मुवेबल ब्रिज (Moveable bridge) होता है। इसमें ब्रिज का एक छोटा-सा हिस्सा (पाट) लंबवत रूप से ऊपर की ओर उठता है। इस दौरान यह डेक के समानांतर रहता है। इस प्रकार जहाज आसानी से इसके नीचे से गुजर सकते हैं।




नए ब्रिज के बारे में

यह पुल 1914 में बने पुराने कैंटीलीवर ब्रिज की जगह बनाया गया है, जिसे 2022 में बंद कर दिया गया था। यह रामेश्वरम द्वीप को मुख्य भारत भूमि से जोड़ता है। इसे रेल विकास निगम लिमिटेड (RVNL) ने डिजाइन किया है। इसमें 72.5 मीटर का नेविगेशनल स्पैन है, जिसे 17 मीटर तक ऊपर उठाया जा सकता है, ताकि बड़े जहाज आसानी से गुजर सकें। इस ब्रिज की कुल लंबाई 2.07 किलोमीटर है। इस ब्रिज को बनाने में 531 करोड रुपए की लागत आई है।

पंबन ब्रिज दो शहरों को जोड़ता है। इसमें से एक शहर रामेश्वरम (Rameshvaram) पंबन आइसलैंड पर स्थित है और दूसरा मंडपम (Mandapum) भारत के मुख्य भूमि पर स्थित है। पंबन आइसलैंड को रामेश्वरम आइसलैंड (Rameshvaram Island) भी कहते हैं। रामेश्वरम मंदिर (Rameshwar Temple) इसी आइसलैंड पर स्थित है। मंडपम और पंबन आइसलैंड तमिलनाडु (Tamilanadu) के रामनाथपुरम जिला के अंतर्गत आते हैं।

1914 में बना पंबन ब्रिज केवल एक रेलवे ब्रिज था। 1988 में इसी के समानांतर एक रोड ब्रिज बनाया गया। अब (2025 में) कमजोर हो गए पुराने पंबन रेलवे ब्रिज को रिप्लेस करने के लिए नया पंबन ब्रिज बनाया गया है।

अन्य जानकारी

पंबन आइसलैंड और श्रीलंका को जोड़ने वाली पाक जलडमरूमध्य पाक की खाड़ी और मन्नार की खाड़ी को अलग करती है।

भारत के कुछ महत्वपूर्ण ब्रिज

  • चिनाब रेल पुल : यह दुनिया के सबसे ऊंचे रेलवे पुलों में से एक है। यह जम्मू-कश्मीर में चिनाब नदी पर बना है।
  • अटल सेट : यह मुंबई में बना सबसे लंबा समुद्री पुल है।
  • बोगीबील पुल : यह असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बना रेल-सह-सड़क पुल है।

परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंताएं बढ़ी

परिसीमन को लेकर दक्षिण भारत के राजनीतिक गलियारों में संदेह और डर का माहौल बन गया है। इन राज्यों को इस बात की चिंता है कि परिवार नियोजन का, जिनका उन्होंने प्रभावी ढंग से पालन किया, उसका नुकसान उठाना पड़ सकता है। वहीं उत्तर के राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश जैसे जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों को इसका (परिसीमन का) फायदा हो सकता है।



हाल ही में, तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने 25 फरवरी को केंद्र पर निशाना साधते हुए जनता से कहा कि अगले परिसीमन के बाद तमिलनाडु की 18 लोकसभा सीटें कम हो जाएंगी। परिणामस्वरुप हमारे पास केवल 31 सांसद रह जाएंगे। आपको बता दें कि वर्तमान में तमिलनाडु से लोकसभा में कुल 39 सांसद चुनकर आते हैं।

एमके स्टालिन ने परिसीमन से पैदा होने वाली संभावित चुनौतियों पर 5 मार्च को तमिलनाडु के राजनीतिक दलों की एक मीटिंग बुलाई है। गौरतलब है कि मुख्यमंत्री का बयान ऐसे समय में आया है जब राज्य में अगले ही वर्ष विधानसभा चुनाव होने है और स्टालिन केंद्र की एनडीए सरकार के धुर राजनीतिक विरोधी हैं।

स्टालिन के बयान पर केंद्रीय गृह मंत्री ने आश्वासन दिया है कि परिसीमन के परिणामस्वरूप लोक सभा सीटों में होने वाली किसी भी वृद्धि में दक्षिणी राज्यों को उनका उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा। साथ ही, उन्होंने कहा कि आनुपातिक आधार पर दक्षिणी राज्यों की एक भी लोक सभा सीट कम नहीं की जाएगी।

2024 में 'द हिंदू' में प्रकाशित एक खबर में कहा गया था कि परिसीमन अभ्यास के संबंध में सार्वजनिक डोमेन में दो विकल्पों पर चर्चा की जा रही है- पहला, मौजूद 543 सीटों को जारी रखना और विभिन्न राज्यों के बीच उनका पुनर्वितरण करना (तालिका 1) और दूसरा, विभिन्न राज्यों के बीच आनुपातिक वृद्धि के साथ सीटों की संख्या को 848 तक बढ़ाना (तालिका 2)।



परिसीमन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंताएं

जनसंख्या नियंत्रणः जनसंख्या के आधार पर परिसीमन से लोक सभा में दक्षिणी राज्यों की सीटों की संख्या कम हो सकती है, जो उनके द्वारा जनसंख्या नियंत्रण हेतु प्रभावी प्रयासों के लिए एक दंड जैसा हो सकता है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व में असंतुलनः जनसंख्या के आधार पर सीटों के पुनर्वितरण से संसद में दक्षिणी राज्यों का प्रभाव और उनका राजनीतिक महत्त्व कम हो सकता है।

संघवाद और क्षेत्रीय स्वायत्तता पर असरः प्रतिनिधित्व में बड़े बदलाव से संघीय व्यवस्था कमजोर हो सकती है, क्योंकि इससे राष्ट्रीय नीतियां मुख्य रूप से उत्तरी राज्यों के हितों के अनुसार बनाई जा सकती हैं। इससे दक्षिणी राज्यों के लोगों में असंतोष पैदा हो सकता है।


परिसीमन के बारे में

इसका तात्पर्य है कि लोकसभा और विधान सभाओं के लिए प्रत्येक राज्य में सीटों की संख्या और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमा तय करने की प्रक्रिया।


संवैधानिक प्रावधानः

  • अनुच्छेद 82 और 170 में प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों (संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों और विधान सभा निर्वाचन क्षेत्रों) में पुनः समायोजित करने का प्रावधान किया गया है। इसे ऐसे प्राधिकार और ऐसी रीति से किया जाएगा, जैसा संसद विधि द्वारा निर्धारित करे।
  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में लोक सभा और राज्य विधान सभाओं में अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या पुनर्निर्धारित करने का प्रावधान है।


परिसीमन प्रक्रिया में संशोधन

  • वर्ष 1976 में 42वें संविधान संशोधन के तहत राज्यों की परिवार नियोजन योजनाओं को ध्यान में रखते हुए केंद्र सरकार द्वारा परिसीमन के तहत सीटों की संख्या में परिवर्तन किए जाने पर वर्ष 2001 की जनगणना तक रोक लगा दी गई थी।
  •  वर्ष 1981 और वर्ष 1991 की जनगणना के बाद परिसीमन नहीं किया गया।
  • वर्ष 2002 में संविधान के 84वें संशोधन के साथ इस प्रतिबंध को वर्ष 2026 तक बढ़ा दिया गया।
  • परिसीमन की प्रक्रिया को प्रतिबंधित करने के पीछे सरकार का यह तर्क था कि वर्ष 2026 तक (अनुमानतः) सभी राज्यों में जनसंख्या वृद्धि का औसत सामान हो जाएगा।
  • संविधान की 84वें संशोधन के अनुसार वर्ष 2026 की जनगणना के आंकड़े जारी होने तक लोकसभा का परिसीमन वर्ष 1971 की जनगणना के आधार पर ही किया जाएगा।
  • साथ ही राज्यों के विधानसभाओं का परिसीमन वर्ष 2001 की जनगणना के आधार पर किया जाएगा।

परिसीमन आयोग (Delimitation Commission)

  • परिसीमन आयोग को सीमा आयोग (Boundary Commission) के नाम से भी जाना जाता है।
  • प्रत्येक जनगणना के बाद भारत की संसद द्वारा संविधान के अनुच्छेद-82 के तहत एक परिसीमन अधिनियम लागू किया जाता है। 
  • परिसीमन आयोग का गठन भारत के राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है तथा यह भारत निर्वाचन आयोग के सहयोग से कार्य करता है।
  • परिसीमन आयोग का गठन 1952, 1962, 1972 और 2002 के अधिनियमों के आधार पर अब तक चार बार वर्ष 1952, 1963, 1973 और 2002 में किया गया था।
  • पहले परिसीमन अभ्यास वर्ष 1950-51 में राष्ट्रपति (चुनाव आयोग की मदद से) द्वारा किया गया था।

परिसीमन आयोग की संरचना 

  • परिसीमन आयोग की अध्यक्षता उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत न्यायाधीश द्वारा की जाती है।
  • इसके अतिरिक्त इस आयोग में निम्नलिखित सदस्य शामिल होते हैं-
    •  मुख्य निर्वाचन आयुक्त या उसके द्वारा नामित कोई निर्वाचन आयुक्त।
    • संबंधित राज्यों के निर्वाचन आयुक्त।

सहयोगी सदस्य (Associate Members): 

आयोग परिसीमन प्रक्रिया के क्रियान्वयन के लिये प्रत्येक राज्य से 10 सदस्यों की नियुक्ति कर सकता है, जिनमें से 5 लोकसभा के सदस्य तथा 5 संबंधित राज्य की विधानसभा के सदस्य होंगे।


सहयोगी सदस्यों को लोकसभा स्पीकर तथा संबंधित राज्यों के विधानसभा स्पीकर द्वारा नामित किया जाएगा।


इसके अतिरिक्त परिसीमन आयोग आवश्यकता पड़ने पर निम्नलिखित अधिकारियों को बुला सकता है:

  • महापंजीयक एवं जनगणना आयुक्त, भारत (Registrar General and Census Commissioner of India)।
  • भारत के महासर्वेक्षक (The Surveyor General of India)।
  • केंद्र अथवा राज्य सरकार से कोई अन्य अधिकारी।
  • भौगोलिक सूचना प्रणाली का कोई विशेषज्ञ।
  • या कोई अन्य व्यक्ति, जिसकी विशेषज्ञता या जानकारी से परिसीमन की प्रक्रिया में सहायता प्राप्त हो सके।


परिसीमन आयोग की शक्तियाँ

  • परिसीमन आयोग एक स्वतंत्र निकाय है, यह आयोग भारतीय संविधान के तहत प्रदत्त शक्तियों के माध्यम से देश में परिसीमन का कार्य करता है।
  • परिसीमन आयोग के आदेश राष्ट्रपति द्वारा निर्दिष्ट तिथि से लागू होते हैं।
  • आयोग के आदेशों को कानून की तरह जारी किया जाता है और इन आदेशों को किसी भी न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती।
  • परिसीमन की प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद आयोग के आदेशों की प्रतियाँ लोकसभा और संबंधित विधानसभा के समक्ष रखी जाती हैं।
  • लोकसभा अथवा विधानसभा को परिसीमन आयोग के आदेशों में किसी भी प्रकार के संशोधन की अनुमति नहीं होती है।

आगे की राह

  • पिछले परिसीमन अभ्यास ने बताया कि भारत की जनसंख्या में वृद्धि हुई है तथा राजनीतिक प्रतिनिधित्व में परिणामी विषमता को दूर करने की आवश्यकता पर बल दिया है।
  • परिसीमन की कसौटी के रूप में केवल जनसंख्या पर निर्भर रहने के बजाय अन्य कारकों जैसे कि विकास संकेतक, मानव विकास सूचकांक और परिवार नियोजन कार्यक्रमों को लागू करने के प्रयासों पर विचार करना चाहिये। यह राज्यों की ज़रूरतों और उपलब्धियों का अधिक व्यापक एवं न्यायसंगत प्रतिनिधित्व प्रदान करेगा।
  • जिन राज्यों ने प्रभावी ढंग से परिवार नियोजन कार्यक्रमों को लागू किया है उनके प्रयासों की सराहना और पुरस्कृत किया जाना चाहिये।
  • संतुलित दृष्टिकोण को शामिल करने के लिये निधियों के हस्तांतरण के दिशा-निर्देशों की समय-समय पर समीक्षा की जानी चाहिये। 



इक होर अश्वथामा के लेखक को मिला साहित्य अकादमिक पुरस्कार

हाल ही में, चमन अरोड़ा को उनकी पुस्तक "इक होर अश्वथामा" के लिए डोगरी में साहित्य अकादमी पुरस्कार 2024 से सम्मानित किया गया है।



साहित्य अकादमी पुरस्कार के बारे में

साहित्य अकादमी पुरस्कार की शुरुआत 1954 में की गई थी। यह पुरस्कार साहित्य अकादमी द्वारा दिया जाता है। यह अकादमी केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तहत एक स्वायत्त निकाय है। 

पहला पुरस्कार 1955 में दिया गया था।

यह पुरस्कार अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त किसी भी प्रमुख भारतीय भाषा में प्रकाशित साहित्यिक दृष्टि से सबसे उत्कृष्ट रचनाओं के लिए दिया जाता है।

अकादमी द्वारा मान्यता प्राप्त भाषाओं में संविधान की अनुसूची VIII के तहत सूचीबद्ध 22 भाषाएं तथा अंग्रेजी व राजस्थानी शामिल हैं।

पुरस्कार एक मंजूषा के रूप में होता है। इसमें एक उत्कीर्ण तांबे की पट्टिका होती है और 1,00,000/-रुपये नकद दिए जाते है।

मुख्यमंत्री राहत कोष (CMRF) पर भारत निर्वाचन आयोग (ECI) का फैसला सही है या गलत

सुखियां

हाल ही में, भारत चुनाव आयोग (ECI) ने लोकसभा चुनाव के मद्देनजर मुख्यमंत्री रहस्य कोष (CMRF) से संबंधित एक अहम फैसला लिया है।



भारत के निर्वाचन आयोग ने मुख्यमंत्री राहत कोष से किए जाने वाले कुछ आपातकालीन कार्यों को आदर्श आचार संहिता के दायरे से मुक्त कर दिया है।

इस कोष का उद्देश्य बड़ी प्राकृतिक आपदाओं, दुर्घटनाओं आदि से प्रभावित लोगों को राहत प्रदान करना है।


मुख्यमंत्री राहत कोष (CMRF)

प्रधान मंत्री राहत कोष के समान ही, यह कोष भी मुख्य रूप से सार्वजनिक और निजी संस्थानों, स्वैच्छिक संगठनों आदि से प्राप्त दान से संचालित होता है।

CMRF को दिए गए दान को आयकर अधिनियम, 1961 की धारा 80G के तहत आयकर से 100% छूट प्राप्त है।


आदर्श आचार संहिता 

यह भारत के चुनाव आयोग द्वारा सरकार और राजनीतिक दलों के लिए बनाया गया नियम है, जिसे सभी राजनीतिक दलों को मानना अनिवार्य है।

यह नियम चुनाव घोषणा की तिथि से लेकर मतदान के अंतिम परिणाम आने तक लागू रहता है।

2024 के लोकसभा चुनाव के लिए यह 16 मार्च से लागू हो गया है।

आदर्श आचार संहिता के तहत निम्नलिखित नियम शामिल है:

  • सरकार के द्वारा लोक लुभावन घोषणाएँ नहीं करना।
  • चुनाव के दौरान सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग न करना।
  • राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के द्वारा जाति, धर्म व क्षेत्र से संबंधित मुद्दे न उठाना।
  • चुनाव के दौरान धन-बल और बाहु-बल का प्रयोग न करना।
  • आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद किसी भी व्यक्ति को धन का लोभ न देना।
  • आचार संहिता लागू हो जाने के बाद किसी भी योजनाओ को लागू नहीं कर सकते।

बड़ी दिलचस्प है लोकसभा चुनाव के नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया

लोक सभा चुनाव 2024 के पहले चरण के लिए नामांकन दाखिल करने की प्रक्रिया की शुरुआत हो चुकी है।



उम्मीदवार लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 33 के तहत नामांकन दाखिल करते हैं।

नामांकन दाखिल करने की तिथि भारत का निर्वाचन आयोग तय करता है।

उम्मीदवार या उसके किसी प्रस्तावक द्वारा नामांकन-पत्र रिटर्निंग ऑफिसर (RO) या सहायक रिटर्निंग ऑफिसर को सौंपना होता है।

किसी मान्यता प्राप्त दल का कोई उम्मीदवार जिस निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव लड़ता है, प्रस्तावक के रूप में उस निर्वाचन क्षेत्र के केवल एक मतदाता की आवश्यकता होती है।

वहीं, निर्दलीय या पंजीकृत गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल के मामले में 10 प्रस्तावकों की आवश्यकता होती है।

कोई उम्मीदवार एक निर्वाचन क्षेत्र से अधिकतम 4 नामांकन दाखिल कर सकता है।

अवकाश के दिन नामांकन-पत्र दाखिल नहीं किए जा सकते हैं।

अमिट स्याही या मतदाता स्याही (Indelible ink or Election ink)

भारतीय निर्वाचन आयोग ने अमिट स्याही (Indelible Ink) के एकमात्र निर्माता मैसूर पेंट्स एंड वार्निश लिमिटेड (MPVL) को 26.55 लाख शीशियां बनाने का ऑर्डर दिया है। यह अब तक का सबसे बड़ा ऑर्डर है।


अमिट स्याही (Indelible Ink) का उपयोग

अमित स्याही का उपयोग व्यक्ति को चुनाव में दोबारा मतदान करने से रोकने के लिए तथा पल्स पोलियो प्रोग्राम में टीका लगे बच्चों की पहचान के लिए लगाया जाता है।

अमिट स्याही का निर्माण

अमित स्याही का निर्माण भारत में दो जगह पर किया जाता है। पहला रायुडू लैबोरेट्री, तेलंगाना और दूसरा मैसूर पेंट्स और वार्निश लिमिटेड कंपनी, मैसूर।

इसमें 10 से 18 प्रतिशत सिल्वर नाइट्रेट होता है, जो नाखून के साथ अभिक्रिया करने और प्रकाश के संपर्क में आने पर गहरा हो जाता है। इसके अलावा इसमें अन्य रसायनों का भी उपयोग किया जाता है। 

भारत में निर्मित स्याही का उपयोग न सिर्फ भारत में बल्कि दुनिया में भी किया जाता है। भारतीय चुनाव आयोग मैसूर पेंट्स और वार्निश लिमिटेड कंपनी द्वारा निर्मित स्याही का उपयोग करती है जबकि रायडू लैबोरेट्री दुनिया के दूसरे देशों के लिए स्याही का निर्माण करता है।

वर्तमान में 90 से अधिक देश इस तरह की स्याही का इस्तेमाल करते हैं। इसमें से 30 देश की स्याही भारत द्वारा निर्मित से स्याही होती है।

ECI के नियम

चुनाव संचालन नियम, 1961 के नियम 49K में प्रावधान किया गया है कि पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी प्रत्येक मतदाता की बायीं तर्जनी अंगुली का निरीक्षण कर सकता है और उस पर एक अमिट स्याही का निशान लगा सकता है।

इसे अमिट स्याही इसलिए कहा जाता है, क्योंकि एक बार लगाने के बाद इसे कई महीनों तक किसी रसायन, डिटर्जेंट, साबुन या तेल से नहीं हटाया जा सकता। इसका रंग पर्पल होता है।

भारतीय चुनाव आयोग 1960 से इस स्याही का उपयोग कर रहा है।




इंफोसिस फाउंडेशन की पूर्व अध्यक्षा सुधा मूर्ति को राज्य सभा के लिए मनोनीत किया गया है

हाल ही में, इंफोसिसफाउंडेशन की पूर्व अध्यक्षा सुधा मूर्ति को राज्य सभा के लिए मनोनीत किया गया है।



राज्य सभा में मनोनयन

कार्य आवंटन नियम, 1961 के तहत “राज्य सभा के लिए नामांकन” विषय गृह मंत्रालय को आवंटित किया गया है।

संविधान के अनुच्छेद 80(3) के तहत राष्ट्रपति साहित्य, विज्ञान, कला और सामाजिक सेवा जैसे क्षेत्रों में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले 12 सदस्यों को राज्य सभा में मनोनीत करेगा।

राम गोपाल सिंह सिसोदिया बनाम अपने सचिव एवं अन्य के जरिए भारत संघ वाद, 2012 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 80(3) के तहत सचिन तेंदुलकर के मनोनयन को बरकरार रखा था।

उज्जैन में दुनिया की पहली वैदिक घड़ी ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी' का उद्घाटन किया गया

उज्जैन में दुनिया की पहली वैदिक घड़ी ‘विक्रमादित्य वैदिक घड़ी' का उद्घाटन किया गया। यह भारतीय 'पंचांग' गणना पर आधारित है।



यह घड़ी उज्जैन (मध्य प्रदेश) में जंतर-मंतर परिसर में स्थित है। जंतर-मंतर एक वेधशाला है। इसका निर्माण 18वीं शताब्दी की शुरुआत में जयपुर के राजा सवाई जयसिंह द्वितीय ने कराया था ।

उन्होंने भारत के पांच शहरों में जंतर-मंतर का निर्माण कराया था। ये हैं: उज्जैन, दिल्ली, मथुरा, वाराणसी और जयपुर ।

जयपुर स्थित जंतर-मंतर यूनेस्को-विश्व धरोहर स्थल है।

उज्जैन जीरो मेरिडियन लाइन और कर्क रेखा (Tropic of Cancer) के सटीक मिलन बिंदु पर अवस्थित है।

हिंदू ज्योतिष-शास्त्र के अनुसार, उज्जैन को कभी भारत का सेंट्रल मेरिडियन माना जाता था । यह शहर भारत के टाइम जोन और समय में अंतर का निर्धारण करता था।

जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने खोजे गए सी स्लग को मेलानोक्लामिस द्रौपदी (एम. द्रौपदी) नाम दिया है

हाल ही में, जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने खोजे गए सी स्लग को मेलानोक्लामिस द्रौपदी (एम. द्रौपदी) नाम दिया है।



हेड-शील्ड, सी स्लग की एक नई समुद्री प्रजाति है जिसकी खोज पश्चिम बंगाल व ओडिशा के तटों पर की गई है। जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने इसका नाम देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मू के नाम पर “मेलानोक्लामिस द्रौपदी (एम. द्रौपदी)" रखा है।

यह प्रजाति अपना पर्यावास मेलानोक्लैमिस बेंगालेंसिस के साथ साझा करती है। मेलानोक्लैमिस बेंगालेंसिस की खोज 2022 में की गई थी। हालांकि, यह आकृति विज्ञान की दृष्टि से एम. द्रौपदी से अलग है।

एम.द्रौपदी बेंगालेंसिस से आकार में छोटी है। इसका रंग धब्बेदार भूरा व काला है। इसके पश्च कवच (posterior shield) पर रुबि लाल रंग का धब्बा है।

सी स्लग तेज शिकारी होते हैं। वे अन्य विचरण करने वाले जीवों को अपना शिकार बनाते हैं। इन जीवों में खोलयुक्त व बिना खोल वाले स्लग, गोलकृमि (Roundworms), समुद्री कृमि, छोटी मछलियां आदि शामिल हैं।

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री ने "भारत में तेंदुओं की स्थिति रिपोर्ट 2022” जारी की

हाल ही में, केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री ने "भारत में तेंदुओं की स्थिति रिपोर्ट 2022” जारी की है।

यह तेंदुओं की आबादी की गणना का पांचवां चक्र था। इसका आयोजन राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण और भारतीय वन्यजीव संस्थान ने राज्य वन विभागों के सहयोग से किया था।



यह गणना प्रत्येक चार वर्ष पर "बाघ, सह-शिकारी, शिकार और उनके पर्यावास की निगरानी" (Monitoring of Tiger, Co-predators, prey and their Habitat) कार्यक्रम के तहत की जाती है।

इस गणना में बाघों के पर्यावास वाले 18 राज्यों में तेंदुओं के वन-पर्यावासों को शामिल किया गया था। इनमें चार बड़े बाघ संरक्षण भू-क्षेत्र (landscapes) शामिल हैं।

तेंदुओं की गणना के लिए वन विहीन पर्यावास तथा शुष्क और 2000 मीटर से अधिक की ऊंचाई वाले उच्च हिमालय से सैंपल नहीं लिए गए हैं।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदुओं पर एक नजर

भारत में तेंदुओं की अनुमानित संख्या 2022 में बढ़कर 13,874 हो गई थी, जो 2018 में 12,852 थी। यह 1.08% की वृद्धि है। यह संख्या सैंपल में शामिल क्षेत्रों पर आधारित है।

मध्य भारत और पूर्वी घाट में तेंदुओं की आबादी में सबसे अधिक वृद्धि दर्ज की गई। वहीं शिवालिक और गंगा के मैदानी इलाकों में इनकी संख्या में गिरावट दर्ज की गई है।

तेंदुओं की सबसे अधिक आबादी मध्य प्रदेश में है। उसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु का स्थान है।

तेंदुओं की सबसे अधिक आबादी वाला टाइगर रिज़र्व नागार्जुनसागर है। इसके बाद श्रीशैलम, पन्ना और सतपुड़ा टाइगर रिज़र्व हैं।

भारतीय तेंदुए (पैंथेरा पार्डस फुस्का) के बारे में

संरक्षण स्थितिः
  • IUCN रेड लिस्टः वल्नरेबल ।
  • CITES: परिशिष्ट-1 में सूचीबद्ध।
  • वन्य जीव संरक्षण अधिनियम 1972: अनुसूची 1 में सूचीबद्ध ।
  • पर्यावासः ये भारत, नेपाल, भूटान और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में पाए जाते हैं। ये मैंग्रोव वनों और मरुस्थलों में नहीं पाए जाते हैं।

विशेषताएं:

यह एकान्तप्रिय और निशाचर जीव हैं।

ये आसानी से पेड़ों पर चढ़ जाते हैं और पेड़ों की शाखाओं पर आराम करते हैं।

कर्नाटक और आंध्रप्रदेश सरकार ने नबालिकों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लागया

हाल ही में कर्नाटक और आंध्रप्रदेश सरकार ने नबालिकों की सुरक्षा और हितों को ध्यान में रखते हुए सोशल मीडिया के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। ...